*ज्ञानसागर ग्रंथमाला* *चण्डकौशिक* *लेखक ( मुनि कन्हैयालाल* )
*ज्ञानसागर ग्रंथमाला* *चण्डकौशिक*
*लेखक ( मुनि कन्हैयालाल* )
भगवान महावीर जब श्वेताम्बिक्रा नगरी की ओर प्रस्थान कर रहे थे तब मार्गस्थ लोगों ने कहा - भगवन् ! आप इधर न पधारें। मार्ग में एक भयंकर जहरीला चण्डकौशिक सर्प रहता है। जो भी व्यक्ति इस मार्ग से गुजरता है, उसे वह डस जाता है। सैकड़ों व्यक्ति परलोकगामी बन गये। अब इस मार्ग से कोई भी व्यक्ति आना - जाना नहीं चाहता है। अतः आप भी इस पथ से न पधारें। किन्तु भगवान महावीर उपसर्गों से कब विचलित होने वाले थे ! भय और डर से कब वे पराजित होने वाले थे ! उन्होंने अपना पूर्व निश्चित मार्ग न बदला, मन्द गति से चलते रहे। चण्डकौशिक सर्प की बांबी आयी। भगवान ध्यानस्थ खड़े हो गए। उसने विष छोड़ा। भगवान के पैर के अंगूठे को डसा। उसके जहर का उनके शरीर पर कोई प्रभाव न हुआ। तब फिर उसने उनके कंधों पर चढ़कर कंधों को डसा। फिर भी कोई असर नहीं। भगवान ज्यों के त्यों मेरु की भाँति ध्यान-मुद्रा में लीन रहे। उसे उनका रुधिर बहुत स्वादिष्ट लगा। वह उसे पीने लगा। मन - ही - मन जिज्ञासा जागृत हुई कि क्या कारण है, मेरे विष का इन पर कोई असर नहीं हुआ ? चिंतन, मनन, ऊहापोह करते ही उसे जाति स्मरण ज्ञान हो गया।
ये तो चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर हैं।' झट उनके शरीर से नीचे उत्तरा। उनके चरणों में लोटने लगा। पूर्वभव देखते ही वह दुःख करने लगा, हाय ! साधु जीवन में मैंने गुस्सा किया जिससे मुझे तिर्यञ्चगति में आना पड़ा। अब उसे उन क्रोधजनित कुत्सित कार्यों का भी स्मरण हुआ। उनकी आलोचना व गर्हा करता हुआ शरीर की ममता छोड़कर अनशनपूर्वक वह बांबी में रहने लगा। भगवान महावीर वहाँ से चले। लोगों ने देखा। आश्चर्य हुआ। यह क्या बात, सर्प ने इन्हें डसा नहीं। कुछ नजदीक आकर देखा तो सर्प बिल्कुल शान्त होकर बैठा है। सारे शहर में यह बात प्रसिद्ध हो जाने से सैकड़ों व्यक्ति उसकी पूजा व अर्चना के लिए आने लगे। दूध, खाण्ड, मेवे मिष्ठान आदि चढ़ने लगे। उन पदार्थों की गन्ध से अनेक चींटियाँ जमा हो गईं। सर्प के शरीर को चाटने लगीं। उसने इस असह्य वेदना को समभाव से सहा। क्रोध नहीं किया। समता व क्षमा के प्रभाव से वह देव योनि में उत्पन्न हुआ।
जिस व्यक्ति ने क्रोधावेश में साधु जीवन को बिगाड़ा था, उसी जीव ने तिर्यञ्चगति में समता के झूले में झूलकर अपने जीवन को सुधारा, यह है समता का साकार सुफल|
समता के सद्भाव से,
शत्रु मित्र साकार।
'मुनि कन्हैया' क्रोध से,
निश्चित अमित बिगाड़।
*आभार*
*पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट*
*अहमदाबाद*
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