*ज्ञानसागर ग्रंथमाला* *आत्म - स्वरूप का ज्ञान* *लेखक ( मुनि कन्हैयालाल* )

*ज्ञानसागर ग्रंथमाला* 
 *आत्म - स्वरूप का ज्ञान* 
 *लेखक ( मुनि कन्हैयालाल* )
एक गर्भवती सिंहनी थी। वह अपनी क्षुधा को शान्त करने के लिए शिकार की खोज में जंगल में इधर उधर भटक रही थी। उसने दूर से भेड़ों के एक झुण्ड को चरते देखा। उन पर आक्रमण किया। ज्यों ही छलांग मारी त्यों ही उसके प्राण पखेरू उड़ गये। मातृविहीन बच्चे का जन्म हुआ। भेड़ें उस बच्चे की सार - संभाल में जुट गयीं। भेड़ों के बच्चों के साथ वह सिंह - शिशु बड़ा होने लगा। हर क्रिया भेड़ों की भाँति करने लगा। घास - पात खाकर रहने लगा। भेड़ों से मैं - मैं करना भी सीख लिया। कुछ ही समय पश्चात् वह एक बलिष्ठ सिंह जैसा बलवान बन गया, फिर भी वह अपने आपको भेड़ ही समझता था और उन सब में ही अपना जीवन यापन कर रहा था| उसी जंगल में एक दिन एक सिंह शिकार हेतु आ पहुँचा। उसने उस भेड़ सिंह को देखा। आश्चर्य हुआ भेड़ों के बीच यह सिंह कहाँ से आ गया। उसे यह 'तू भेड़ नहीं, सिंह है' समझाने के लिए ज्यों ही वह आगे बढ़ा त्यों ही भेड़ों का झुण्ड दौड़ने लगा और साथ साथ वह भेड़ सिहं भी। परन्तु उस सिंह ने उस भेड़ - सिंह को अपने यथार्थ स्वरूप का भान कराने के लिए प्रयास नहीं छोड़ा। वह सब कुछ देखता रहा कि यह भेड़ - सिंह कहाँ रहता है, कहाँ सोता है, क्या करता है। एक दिन उसे अकेला देखकर वह छलांग मारकर उसके पास जा पहुँचा और बोला - अरे ! तू भेड़ों के साथ रहकर अपने यथार्थ स्वरूप को कैसे भूल गया ? तू भेड़ नहीं है, तू तो सिंह है। इन भेड़ों के बीच रहकर अपने जीवन को क्यों नष्ट कर रहा है? भेड़ - सिंह ने कहा- मैं तो भेड़ हूँ, सिंह कैसे कहला सकता हूँ? मैं आपका कहना कभी भी मानने वाला नहीं हूँ, चाहे आप कितना भी प्रयत्न करें। यों कहकर वह भेड़ों की भाँति मिमियाने लगा। कुछ ही देर बाद उस सिंह ने भेड़ सिंह को उठाकर किसी तालाब के किनारे ले जाकर कहा, 'अब देख पानी में, जैसा प्रतिबिम्ब मेरा पड़ रहा है वैसा ही प्रतिबिम्ब तेरा है। तेरा और मेरा आकार समान है। अपने सही रूप को भूल रहा है। अब वह अपने प्रतिबिम्ब को देखने लगा। स्वयं के आकार का सही आभास होते ही वह सिंह की तरह गरजने लगा।हर इन्सान में अनन्त शक्ति है। उस शक्ति का दर्शन ही आत्म - दर्शन है। जब तक मानव उसका दर्शन नहीं कर पाता तब तक वह अपने आपको भेड़ - सिंह की भाँति कमजोर और निर्बल समझता है। पर ज्यों ही उसे आत्म - रूप का ज्ञान हो जायेगा, वह सहजानन्द में रमण करने लग जायेगा।
जब तक आत्मा को नहीं, 
आत्म-रूप का भान।
 तब तक वह पर - द्रव्य में, 
करती रमण महान।।
           *आभार* 
 *पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट*   
       ** *अहमदाबाद*

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