*ज्ञानसागर ग्रंथमाला* *शिक्षा का पात्र कौन* ? *लेखक ( मुनि कन्हैयालाल )*
*ज्ञानसागर ग्रंथमाला*
*शिक्षा का पात्र कौन* ?
*लेखक ( मुनि कन्हैयालाल )*
सर्दी का समय था। आकाश में बादल मंडरा रहे थे। झिरमिर - झिरमिर बूँदें गिर रही थी। बिजलियाँ चमक रही थीं। हवा का वेग बढ़ रहा था। ऐसे खराब मौसम में कोई भी मनुष्य घर से बाहर निकलना नहीं चाहता था। पशु भी अपने - अपने स्थान पर सिकुड़े बैठे हुए थे। एक बया अपने घोंसले में बैठा था। उस समय एक बन्दर सर्दी से ठिठुरता हुआ इधर उधर दौड़ रहा था। किसी शरण की खोज में था। बया ने सर्दी से पीड़ित बन्दर को देखा और मुस्कुराता हुआ बोली -
तब कला विपुला प्रतिवर्तते,
तब बपुश्च जनेन समं कपे।
मनसि चित्रमशेषमिहास्ति मे,
किमु न यत् कुरुषे निजमन्दिरम्।।
हे बन्दर । मनुष्य के समान तेरी आकृति है। तू बड़ा होशियार भी है। तथापि तू अपने रहने के लिए कोई सुरक्षित स्थान क्यों नहीं बना रहा है, इस बात का मुझे बड़ा आश्चर्य है। मैं एक छोटा सा अज्ञानी प्राणी हूँ, फिर भी घोड़ा - सा ज्ञान तो अवश्य ही रखता हूँ। मैं अपना घर बनाकर बड़े आनन्द से बैठा हूँ। यदि तू भी घर बना लेता तो आज इस कड़कड़ाती सर्दी में क्यों इधर - उधर भटकना पड़ता, क्यों शरीर ठिठुरता।बया की यह हित - शिक्षा बन्दर को रुचिकर नहीं लगी। मन ही मन कुडकुड़ाने लगा-हाय । यह छोटा तुच्छ प्राणी मुझे उपदेश दे रहा है। शिक्षा सुना रहा है। इसने मेरा अपमान किया है। इस अपमान को में सह नहीं सकता। बया के घोंसले को देखा और वह उछला। एक क्षण में बया के घर को तोड़कर वृक्ष पर जा बैठा। अभिमानपूर्वक वह बोला- बया! तूने मेरी करतूत देखी। मैं कितना कला - निपुण और शक्तिशाली बन्दर हूँ। मेरे सामने तेरी क्या शक्ति है ? बया बेचारा आंखें मलता हुआ बोला- कुपात्र को कभी भी हितशिक्षा नहीं देनी चाहिए। अगर मैं मौन रहता तो आज यह दुष्परिणाम क्यों भोगना पड़ता है |
विवेकशील व्यक्ति पात्र - अपात्र को देखकर ही उपदेश देते हैं। अपात्र को दिया हुआ उपदेश नुकसान करता है। अतः योग्यायोग्य की परीक्षा अवश्य ही करनी चाहिए।
शिक्षा देना योग्य को,
करके हृदय विचार।
'मुनि कन्हैया' अन्यथा,
होगा अमित बिगाड़।।
*आभार*
*पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट*
*अहमदाबाद*
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