ज्ञानसागर ग्रंथमाला* *दुर्जन का संग* *लेखक ( मुनि कन्हैयालाल )*
*ज्ञानसागर ग्रंथमाला*
*दुर्जन का संग*
*लेखक ( मुनि कन्हैयालाल )*
एक हंस और एक कौवे में एक बार अच्छी दोस्ती हो गई। गगन विचरण करते हुए दोनों एक वृक्ष पर जा बैठे। प्रेमपूर्वक दोनों बातें करने लगे। किन्तु स्वभाव से दोनों अलग - अलग थे। हंस की गतिविधि सज्जन जैसी थी और कौवे की दुर्जन जैसी। अचानक उसी वृक्ष की शीतल छाया में विश्राम लेने के लिये थका हुआ एक मुसाफिर आ गया। वह अपनी चादर बिछाकर सो गया। श्रान्त होने के कारण सहसा गहरी नींद आ गई। वृक्ष पर बैठे हुए हंस ने देखा कि पथिक के बदन पर सूर्य की कुछ किरणें पड़ रही हैं। तीव्र ताप के कारण इसकी नींद टूट जायेगी। इस कारण हंस अपनी पाँखें फैलाकर बैठ गया। सारी धूप उसके पंखों पर समाहित हो गई। यह बात कौवे को अच्छी नहीं लगी। उसने सोचा - हंस बिल्कुल भोला है। पथिक की चिन्ता में खुद कितना ताप सह रहा है। पथिक को आराम क्यों देता है? उसके सुख को पचा नहीं सकने के कारण कौवे ने मुसाफिर के मुख पर विष्ठा कर दी।
पथिक की आँखे खुलीं। सोचा - यह दुश्मन कौन ? पंख फैलाए हुए हंसको देखते ही वह तो आग - बबूला हो गया। मलकर्ता उसी हंस को समझकर उसने गोली से उसके प्राण पखेरू उड़ा दिये। दुर्जन के संग से हंस को बिना मौत मरना पड़ा।
दुर्जन का संग कभी भी सुखद नहीं होता है। सज्जन का संग सर्वदा लाभप्रद होता है। 'जैसा संग वैसा रंग' जैसा संग मिलेगा वैसा ही रंग चढ़ जायेगा। अतः हर एक को दुष्ट मनुष्यों की संगति से दूर रहना चाहिए।
दुर्जन कौवे - संग से,
मरा बेचारा हंस।
सज्जन संगति से मनुज,
बनता जग - अवतंस।।
*आभार*
*पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट*
*अहमदाबाद*
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